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बसन्त

बागेश्री

भैरव

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भैरव Raagparichay Tue, 22/02/2022 - 05:05 राग भैरव प्रभात बेला का प्रसिद्ध राग है। इसका वातावरण भक्ति रस युक्त गांभीर्य से भरा हुआ है। यह भैरव थाट का आश्रय राग है। इस राग में रिषभ और धैवत स्वरों को आंदोलित करके लगाया जाता है जैसे -  सा रे१ ग म रे१ रे१ सा । इसमें मध्यम से मींड द्वारा गंधार को स्पर्श करते हुए रिषभ पर आंदोलन करते हुए रुकते हैं। इसी तरह  ग म ध१ ध१ प  में निषाद को स्पर्श करते हुए धैवत पर आंदोलन किया जाता है। इस राग में गंधार और निषाद का प्रमाण अवरोह में अल्प है। इसके आरोह में कभी कभी पंचम को लांघकर मध्यम से धैवत पर आते हैं जैसे -  ग म ध१ ध१ प । इस राग में पंचम को अधिक बढ़ा कर गाने से राग रामकली का किंचित आभास होता है इसी तरह मध्यम पर अधिक ठहराव राग जोगिया का आभास कराता है। भैरव के समप्रकृतिक राग कालिंगड़ा व रामकली हैं। करुण रस से भरपूर राग भैरव की प्रकृति गंभीर है। इस राग का विस्तार तीनों सप्तकों में किया जाता है। इस राग में ध्रुवपद, ख्याल, तराने आदि गाये जाते हैं। इस राग के और भी प्रकार प्रचलित हैं यथा - प्रभात भैरव,...

बिलासखानी तोडी

मोहनकौन्स

मोहनकौन्स Raagparichay Sun, 20/02/2022 - 22:02   राग मालकौंस में यदि आरोह में गंधार शुद्ध और अवरोह में गंधार कोमल का प्रयोग किया जाय तो वह राग मोहनकौंस बन जायेगा। यह राग पूर्वांग में राग जोग और उत्तरांग में राग मालकौंसका मिश्रण है। यह एक सीधा राग है और इसे तीनों सप्तकों में उन्मुक्त रूप से गाया जा सकता है। यह राग एक शांत और गंभीर वातावरण पैदा करता है। यह स्वर संगतियाँ राग मोहनकौंस का रूप दर्शाती हैं -  सा ,नि१ ,ध१ ; ,ध१ ,नि१ सा ; सा ग ग म ; ग म ग१ सा ; ग म ध१ म ; ध१ नि१ सा' ; सा' ग१' सा' नि१ ध१ म ग ; म नि१ ध१ म ग ; म ध१ ग ; म ग१ सा; यह राग बहुत ही मधुर परंतु अपेक्षाकृत नया होने के कारण बहुत प्रचलन में नहीं है। परंतु  उस्ताद सलामत अली और नज़ाकत अली खान  द्वारा यह राग गाया गया है। जिससे प्रभावित हो कर  आचार्य तनरंग  जी ने मोहनकौंस में बंदिशों की रचना की है। मूलतः, महात्मा गाँधी को समर्पित करते हुए  पंडित रवि शंकर जी  ने राग मोहनकौंस की रचना की है, जो इस प्रकार है -  सा ग म ध१ नि१ सा' - सा' नि१ ध१ म ग ; म रे ग म सा; ...

मेघ मल्हार

मेघ मल्हार Raagparichay Sun, 20/02/2022 - 18:08 राग मेघ मल्हार बहुत ही मधुर और गंभीर वातावरण पैदा करने वाला राग है। इस राग के सभी स्वर राग मधुमाद सारंग के ही सामान हैं। परन्तु राग मधुमाद सारंग में सारंग अंग प्रभावी होता है जैसे -  सा रे म रे ; म प नि१ प म रे , जिसमें वादी स्वर रिषभ है और मध्यम-रिषभ की संगती में मींड का उपयोग नहीं किया जाता। जबकि राग मेघ मल्हार में रिषभ हमेशा मध्यम का कण स्वर लेते हुए लगते हैं। इसी प्रकार राग मधुमाद सारंग में  नि१-प  बिना मींड के सीधा गाया जाता है जबकि मेघ मल्हार में  नि१-प  गाते समय मींड का प्रयोग करते हुए पंचम को कण स्वर लेते हुए  (प)नि१-प  लेते हैं मेघ मल्हार का वादी स्वर  सा  है। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है अतः इसमें ध्रुवपद अंग का प्रभाव होने के कारण इस राग में गमक और मींड का उपयोग ज्यादा किया जाता है। इस राग में रिषभ और पंचम की संगती मल्हार अंग प्रदर्शित करती है। इस राग का विस्तार तीनों सप्तको में किया जा सकता है। गुरुमुख से सीखने से ही इस राग को आत्मसात किया जा स...

भटियार